भारतीय संविधान के वो चौंकाने वाले मोड़: 6 सबसे प्रभावशाली और क्रांतिकारी संशोधन

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क्या कोई संविधान पत्थर की लकीर है, जिसे समय की धूल कभी छू नहीं सकती? या फिर यह एक बढ़ते हुए राष्ट्र की धड़कनों की तरह जीवंत और गतिशील है? एक विधिक विशेषज्ञ के रूप में, मैं इसे ‘मूलभूत कानून के सिद्धांत’ (Theory of fundamental law) और ‘संसदीय संप्रभुता’ (Parliamentary sovereignty) के बीच एक उत्कृष्ट संतुलन मानता हूँ। 1,17,000 से अधिक शब्दों के साथ दुनिया का सबसे विस्तृत और लिखित दस्तावेज़ होने के नाते, हमारा संविधान केवल एक कानून की किताब नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का दर्पण है।

जवाहरलाल नेहरू ने 1948 में संविधान सभा में इस संतुलन को बहुत खूबसूरती से स्पष्ट किया था:

“यद्यपि हम इस संविधान को उतना ही ठोस और स्थायी बनाना चाहते हैं जितना हम बना सकते हैं, फिर भी संविधानों में कोई स्थायित्व नहीं होता। इसमें लचीलापन होना चाहिए। यदि आप किसी चीज़ को कठोर और स्थायी बना देते हैं, तो आप एक राष्ट्र की प्रगति, एक जीवंत, प्राणवान, जैविक जनसमूह का विकास (growth of a living, vital, organic people) रोक देते हैं।”

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दुनिया का सबसे संशोधित संविधान: एक रिकॉर्ड या ज़रूरत?

भारतीय संविधान दुनिया में सबसे अधिक बार संशोधित होने वाले दस्तावेज़ों में गिना जाता है, जहाँ औसतन प्रति वर्ष दो संशोधन होते हैं। आलोचक इसे इसकी अस्थिरता कह सकते हैं, लेकिन एक कानूनविद् की दृष्टि में यह इसकी अनुकूलन क्षमता है। इसका एक प्रमुख कारण “साधारण कानूनों का संविधानीकरण” (Constitutionalization of ordinary law) है। अन्य लोकतंत्रों में जो मामले साधारण विधियों द्वारा सुलझाए जाते हैं, भारत में उनके लिए संसदीय शक्तियों का इतना सूक्ष्म विवरण दिया गया है कि अक्सर संशोधन की आवश्यकता पड़ती है।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस लचीलेपन का बचाव करते हुए कहा था:

“प्रारूप संविधान में संशोधन के प्रावधानों को समझने के लिए अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के संविधानों की जटिल प्रक्रियाओं का अध्ययन करना होगा। उनकी तुलना में हमारा प्रारूप सबसे सरल होगा। हमने कन्वेंशन या जनमत संग्रह जैसी विस्तृत और कठिन प्रक्रियाओं को हटा दिया है। भविष्य की संसद, यदि वह दलगत हितों से ऊपर उठकर काम करे, तो उसे संविधान में आवश्यक बदलाव करने से रोका नहीं जाना चाहिए।”

1. बुनियादी संरचना का सिद्धांत: न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा

भारतीय संवैधानिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 1973 का केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामला था। यहाँ पहली बार संसद की ‘संविधान निर्मात्री शक्ति’ (Constituent Power) और ‘विधायी शक्ति’ (Legislative Power) के बीच अंतर स्पष्ट किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुनियादी संरचना का सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।

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अदालत ने कहा कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है, लेकिन इसके ‘मूल ढांचे’ को नहीं। बाद में, मिनर्वा मिल्स (1980) मामले में कोर्ट ने 42वें संशोधन के उस प्रावधान को निरस्त कर दिया जिसने संसद को असीमित संशोधन शक्ति देने की कोशिश की थी। धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा और न्यायिक समीक्षा जैसे तत्व इसी ‘लक्ष्मण रेखा’ का हिस्सा हैं।

2. संपत्ति का अधिकार: मौलिक से ‘मानवाधिकार’ तक का सफर

आजादी के बाद ज़मींदारी उन्मूलन और सामाजिक न्याय के लिए भूमि सुधार अनिवार्य थे, लेकिन ‘संपत्ति का अधिकार’ (अनुच्छेद 19 और 31) इसमें बाधा बना। इसे दबाने के लिए ‘9वीं अनुसूची’ का निर्माण किया गया, जो मौलिक अधिकारों के हनन के बावजूद कानूनों को न्यायिक समीक्षा से बचाती थी।

अंततः, 44वें संशोधन अधिनियम (1978) ने इसे मौलिक अधिकारों से हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत एक संवैधानिक अधिकार बना दिया। दिलचस्प बात यह है कि हालिया न्यायिक रुझानों (जैसे छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय) ने अब संपत्ति को केवल कानूनी नहीं, बल्कि एक ‘मानवाधिकार’ के रूप में स्थापित किया है। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि 44वां संशोधन वास्तव में आपातकाल के दौरान किए गए 42वें संशोधन (लघु संविधान) की विसंगतियों को सुधारने के लिए लाया गया एक सुधारात्मक कदम था।

3. पंचायती राज: जब लोकतंत्र गाँवों तक पहुँचा

भारतीय लोकतंत्र 1992 तक केवल दो-स्तरीय (केंद्र-राज्य) था। 73वें और 74वें संशोधन ने इसे वास्तव में विकेंद्रीकृत किया। आंकड़ों की गहराई देखें तो यह बदलाव कितना विशाल है: आज भारत में 2.39 लाख ग्राम पंचायतें, 6904 ब्लॉक पंचायतें और 589 जिला पंचायतें सक्रिय हैं।

29 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ, यह दुनिया की सबसे बड़ी स्थानीय स्वशासन प्रणाली है। इस संशोधन ने न केवल शक्ति का हस्तांतरण किया, बल्कि महिलाओं और वंचित वर्गों को राजनीति की मुख्यधारा में लाकर ‘सामाजिक न्याय’ की नींव रखी।

4. दल-बदल विरोधी कानून: राजनीतिक शुचिता की तलाश

1960 के दशक की ‘आया राम, गया राम’ वाली राजनीति को रोकने के लिए 52वां संशोधन (1985) लाया गया और 10वीं अनुसूची जोड़ी गई। शुरुआत में 1/3 सदस्यों के ‘विभाजन’ को छूट थी, लेकिन इसे अपर्याप्त मानते हुए 91वें संशोधन (2003) ने ‘विभाजन’ (Split) के प्रावधान को खत्म कर दिया और केवल 2/3 सदस्यों के ‘विलय’ (Merger) को ही मान्यता दी।

कानूनी सूक्ष्मता की बात करें तो कीशम मेघचंद्र सिंह (2020) जैसे हालिया मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्षों को 3 महीने के भीतर दलबदल याचिकाओं पर निर्णय लेने का निर्देश देकर इस कानून को और प्रभावी बनाया है।

5. GST (101वां संशोधन): सहकारी संघवाद की नई मिसाल

वस्तु एवं सेवा कर (GST) ने “एक राष्ट्र, एक कर” के माध्यम से भारत के वित्तीय भूगोल को बदल दिया। अनुच्छेद 279A के तहत गठित GST काउंसिल सहकारी संघवाद का बेहतरीन उदाहरण है। यहाँ निर्णय लेने के लिए तीन-चौथाई (75%) बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसमें केंद्र और राज्यों का सह-अस्तित्व अनिवार्य है।

इस मंच की सफलता का प्रमाण यह है कि अपनी पहली 37 बैठकों में काउंसिल ने लगभग सभी निर्णय ‘सर्वसम्मति’ (Consensus) से लिए, जो भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को दर्शाता है।

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6. 86वां संशोधन: शिक्षा का अधिकार

2002 में आए इस संशोधन ने अनुच्छेद 21A जोड़कर 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया। इसने न केवल राज्य पर जिम्मेदारी डाली, बल्कि अनुच्छेद 51A (k) के तहत माता-पिता का भी यह ‘मूल कर्तव्य’ बनाया कि वे अपने बच्चों को अवसर प्रदान करें। यह संशोधन भविष्य की पीढ़ी के निर्माण के लिए सबसे महत्वपूर्ण निवेश है।

निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक दृष्टि

संशोधन की प्रक्रिया ही वह ‘सुरक्षा वाल्व’ है जिसने भारतीय संविधान को टूटने से बचाया है। यह प्रक्रिया ही सुनिश्चित करती है कि हमारा संविधान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1950 में था। अंत में, एक संवैधानिक विशेषज्ञ के रूप में मेरा दृढ़ मत है कि ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) ही वह शक्ति है जो बार-बार होने वाले बदलावों के बीच संविधान की मूल आत्मा को सुरक्षित रखती है।

एक विचारणीय प्रश्न आपके लिए: “क्या समय के साथ संविधान को बदलना राष्ट्र की प्रगति का अनिवार्य प्रतीक है, या क्या हमें इस बात से आशंकित होना चाहिए कि बार-बार होने वाले ये बदलाव इसकी बुनियादी पवित्रता को धूमिल कर सकते हैं?”


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