1. प्रस्तावना: एक खामोश क्रांति और उभरती चिंता

भारत में वर्ष 2005 में लागू हुआ सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम केवल एक कानून नहीं था, बल्कि यह एक ‘धूप’ (sunshine law) की तरह था जिसने सरकारी कामकाज की परतों में छिपे अंधेरे को दूर करने का काम किया। इसने नागरिकों को सरकार से सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने की शक्ति दी। हालांकि, आज भारत एक नए कानूनी मोड़ पर खड़ा है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के आने से पारदर्शिता और निजता (Privacy) के बीच एक बड़ा टकराव पैदा हो गया है। जहाँ एक तरफ निजता एक मौलिक अधिकार है, वहीं एक कानूनी विश्लेषक के तौर पर यह चिंता वाजिब है कि नए डेटा कानून की आड़ में पारदर्शिता के उस युग का गला घोंटा जा रहा है जिसकी बुनियाद जवाबदेही पर टिकी थी।
2. ‘सार्वजनिक हित’ के सुरक्षा कवच और संसदीय समानता का अंत
तथ्य #1: सशर्त छूट का ‘पूर्ण प्रतिबंध’ में बदलना RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) की मूल भावना यह थी कि व्यक्तिगत जानकारी को केवल तब छिपाया जा सकता था जब उसका सार्वजनिक गतिविधि से कोई संबंध न हो। लेकिन, यदि ‘जनहित’ (Public Interest) बड़ा होता, तो वह जानकारी देनी अनिवार्य थी। DPDP अधिनियम की धारा 44(3) ने इस ‘क्वालिफाइड एक्जेंप्शन’ (सशर्त छूट) को एक ‘एब्सोल्यूट बार’ (पूर्ण प्रतिबंध) में बदल दिया है। अब जन सूचना अधिकारियों (PIO) के पास यह जांचने का विवेक ही नहीं बचा है कि क्या सूचना का प्रकटीकरण भ्रष्टाचार उजागर करने के लिए आवश्यक है।
तथ्य #2: ‘संसदीय प्रोविज़ो’ (Parliamentary Proviso) का विलोपन सबसे चौंकाने वाला बदलाव धारा 8(1)(j) के उस प्रावधान को हटाना है, जो कहता था कि— “जो जानकारी संसद या राज्य विधानसभा को देने से मना नहीं की जा सकती, वह किसी आम नागरिक को देने से भी मना नहीं की जाएगी।” यह समानता का सिद्धांत पारदर्शिता की रीढ़ था। इसे हटाना स्पष्ट रूप से लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है, क्योंकि अब नागरिक उस सूचना से भी वंचित हो जाएंगे जो निर्वाचित प्रतिनिधियों को उपलब्ध है।
“सूचना का अधिकार बनाम डेटा संरक्षण: पारदर्शिता पर मंडराता खतरा – GKToday” के अनुसार, अब PIO का विवेक समाप्त होने से RTI वास्तव में ‘RDI’ (Right to Deny Information) यानी ‘सूचना से इनकार का अधिकार’ बन सकता है।
3. ‘व्यक्तिगत’ की नई परिभाषा और ₹250 करोड़ का खौफ

तथ्य #3: ‘व्यक्ति’ (Person) के दायरे का विस्तार और सूचना का निषेध RTI के संदर्भ में ‘व्यक्ति’ का अर्थ अक्सर एक प्राकृतिक मानव से लिया जाता था, लेकिन DPDP अधिनियम के तहत ‘व्यक्ति’ की परिभाषा में कंपनियां, संगठन और स्वयं ‘राज्य’ भी शामिल हो सकते हैं। इस विस्तार का अर्थ है कि अब लगभग हर महत्वपूर्ण जानकारी को किसी न किसी ‘इकाई’ की व्यक्तिगत जानकारी बताकर छुपाया जा सकता है। इसके भयावह परिणाम होंगे:
- अब सरकारी कर्मचारियों की मार्कशीट, पेंशन रिकॉर्ड और यहाँ तक कि ‘घोस्ट एम्प्लॉई’ (फर्जी कर्मचारी) की जानकारी भी ‘निजी’ बताकर रोकी जा सकती है।
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-निगरानी (Public Scrutiny) का तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो सकता है।
इसके साथ ही, ₹250 करोड़ तक का भारी-भरकम जुर्माना अधिकारियों के बीच एक गहरा ‘शीतलन प्रभाव’ (Chilling Effect) पैदा कर रहा है।
- जोखिम से बचाव: PIO अब जानकारी देने के बजाय उसे ‘व्यक्तिगत’ बताकर खारिज करना सुरक्षित समझेंगे, क्योंकि गलत प्रकटीकरण पर भारी दंड है, जबकि गलत इनकार पर दंड तुलनात्मक रूप से नगण्य है।
- गोपनीयता की संस्कृति: यह कानून सरकारी कार्यालयों में पारदर्शिता की जगह दोबारा गोपनीयता की पुरानी दीवारें खड़ी कर रहा है।
4. पत्रकार अब ‘डेटा फिडुशियरी’: खोजी पत्रकारिता पर संवैधानिक संकट
तथ्य #4: सहमति (Consent) की अव्यावहारिक बेड़ियाँ नए कानून के तहत पत्रकारों को ‘डेटा फिडुशियरी’ माना जा सकता है। इसका अर्थ है कि जाँच के दौरान पत्रकारों को उस व्यक्ति से ‘सहमति’ लेनी पड़ सकती है जिसके भ्रष्टाचार को वे उजागर करना चाहते हैं। यह ‘स्पष्ट रूप से मनमाना’ (Manifestly Arbitrary) प्रावधान है।
- खोजी पत्रकारिता पर प्रहार: ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ (The Reporters Collective) जैसे संगठनों ने इसी आधार पर अदालत में चुनौती दी है कि भ्रष्टाचार की जांच करते समय अपराधी से सहमति मांगना पत्रकारिता को असंभव बना देगा।
- सत्ता की निगरानी का अंत: “The CSR Journal” के विश्लेषण के अनुसार, यदि पत्रकार बैंक डिफॉल्टरों के नाम या अवैध सरकारी नियुक्तियों के रिकॉर्ड नहीं खोज पाएंगे, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी शक्ति खो देगा।
5. निगरानी की खुली छूट और स्वतंत्र बोर्ड का अभाव
तथ्य #5: कार्यपालिका का वर्चस्व और शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन अधिनियम की धारा 36 सरकार को किसी भी डेटा फिडुशियरी से डेटा मांगने की असीमित शक्तियां देती है, जिसमें स्वतंत्र न्यायिक निगरानी या अपील का कोई तंत्र नहीं है।
- डेटा संरक्षण बोर्ड की स्वायत्तता: बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार ‘सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी’ (Search-cum-Selection Committee) में पूरी तरह से सरकारी सचिवों और नामितों का दबदबा है।
- हितों का टकराव: चूंकि सरकार स्वयं सबसे बड़ी डेटा संग्रहकर्ता (Data Collector) है, इसलिए सरकार द्वारा ही नियुक्त बोर्ड से निष्पक्षता की उम्मीद करना ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत के विपरीत है।

6. सुप्रीम कोर्ट की भूमिका: पुट्टास्वामी और आनुपातिकता का परीक्षण
वर्तमान में यह मामला 5-जजों की संविधान पीठ के पास है, जहाँ इसे 2017 के ऐतिहासिक ‘निजता के अधिकार’ (Puttaswamy judgement) के सिद्धांतों पर परखा जाएगा। अदालत को यह देखना होगा कि क्या यह कानून ‘आनुपातिकता के सिद्धांत’ (Doctrine of Proportionality) के चार मानकों को पूरा करता है:
- वैधानिकता (Legality): क्या यह कानून संवैधानिक ढांचे के भीतर है?
- वैध उद्देश्य (Legitimate Objective): क्या निजता की रक्षा का उद्देश्य पारदर्शिता को खत्म करने का आधार बन सकता है?
- अनिवार्यता (Necessity): क्या निजता बचाने के लिए RTI में बदलाव ही एकमात्र रास्ता था?
- आनुपातिकता (Proportionality): क्या निजता के लाभ, पारदर्शिता के नुकसान की तुलना में अधिक हैं?
7. निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक नजर

भारत एक संवैधानिक दोराहे पर खड़ा है। निजता एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह भ्रष्टाचार और जवाबदेही से बचने की ढाल नहीं बननी चाहिए। RTI को ‘RDI’ में बदलना हमारे लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करना है। हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा: “क्या हम व्यक्तिगत निजता की रक्षा के लिए अपनी लोकतांत्रिक जवाबदेही की बलि देने को तैयार हैं?”
पावरफुल टेकअवे (Powerful Takeaway): निजता और पारदर्शिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक स्तंभ होने चाहिए। एक स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ नागरिकों की निजी जानकारी सुरक्षित हो और सरकार के सार्वजनिक रिकॉर्ड पूरी तरह पारदर्शी। पारदर्शिता की कीमत पर मिली सुरक्षा वास्तव में एक ‘डिजिटल जेल’ के समान है।