चुनाव के बाद ‘गायब’ नेताओं पर लगाम: क्या है राइट टू रिकॉल का असली सच?

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कल्पना कीजिए, एक उम्मीदवार चुनाव के समय आपके द्वार पर आता है, हाथ जोड़कर लोक-लुभावन वादे करता है और आपका मत हासिल कर लेता है। लेकिन जीत का प्रमाण-पत्र मिलते ही वह अगले पांच सालों के लिए परिदृश्य से ‘गायब’ हो जाता है। भारतीय राजनीति की यह कड़वी सच्चाई एक गहरे ‘प्रतिनिधित्व के संकट’ (Representational deficit) को जन्म देती है। यही वह बिंदु है जहाँ हमें जॉन लॉक के ‘सामाजिक अनुबंध’ (Social Contract) के सिद्धांत को याद करने की आवश्यकता है। लॉक के अनुसार, सरकार जनता की ‘सहमति’ पर टिकी होती है, लेकिन यह सहमति कोई स्थायी दान नहीं है। यदि प्रतिनिधि लोक-कल्याण के अपने वादे से मुकर जाए, तो क्या जनता के पास अपनी सहमति वापस लेने का अधिकार नहीं होना चाहिए? क्या प्रतिनिधि को चुनने का अधिकार उसे वापस बुलाने यानी ‘राइट टू रिकॉल’ (RTR) के बिना अधूरा है?

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वेदों से संसद तक: एक प्राचीन विचार की आधुनिक यात्रा

‘राइट टू रिकॉल’ भारत के लिए कोई नया आयातित विचार नहीं है। इसकी जड़ें हमारे प्राचीन दर्शन और आधुनिक क्रांतिकारी विचारों में गहराई से धंसी हुई हैं:

  • प्राचीन जड़ें:  वैदिक काल में ‘राजधर्म’ की अवधारणा स्पष्ट थी—एक अक्षम या भ्रष्ट शासक को पद से हटाना न केवल नैतिक था, बल्कि न्यायसंगत भी माना जाता था।
  • क्रांतिकारी मांग:  आधुनिक युग में, सचिंद्रनाथ सान्याल ने दिसंबर 1924 में ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के घोषणापत्र में इसकी पुरजोर वकालत की थी। इसके बाद 1944 में एम.एन. राय ने शासन के विकेंद्रीकृत मॉडल का प्रस्ताव रखा, जिसमें प्रतिनिधियों को हटाने की शक्ति सीधे मतदाताओं के पास थी।
  • संविधान सभा का अंतर्विरोध:  1947 में संविधान सभा के भीतर इस पर तीखी बहस हुई। जहाँ कुछ सदस्य इसे निरंकुशता रोकने का साधन मानते थे, वहीं डॉ. बी.आर. अंबेडकर और सरदार वल्लभ भाई पटेल इसके विरोध में थे। पटेल का तर्क व्यावहारिक था; उन्होंने कहा था कि यदि कुछ ‘काली भेड़ें’ (Black Sheep) अपना विश्वास खो देती हैं, तो उनके कारण हमें पूरी चुनावी व्यवस्था को अस्थिर करने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए। उनके अनुसार, यह सदस्यों के विवेक पर छोड़ देना बेहतर था।”इस गणराज्य में, मतदाताओं के पास अपने जनसेवकों के ऊपर ‘राइट टू रिकॉल’ का प्रावधान होगा, अन्यथा लोकतंत्र एक मजाक बन जाएगा।” —  सचिंद्रनाथ सान्याल, HRA घोषणापत्र (1924)
मध्य प्रदेश का ‘खाली कुर्सी’ प्रयोग: तकनीकी बारीकियां और कानूनी सबक

भारत में स्थानीय निकाय स्तर पर मध्य प्रदेश इस सुधार की सबसे बड़ी प्रयोगशाला रहा है, जहाँ 2000 से यह कानून प्रभावी है। लेकिन यह प्रयोग जितना क्रांतिकारी था, उतना ही जटिल भी:

  • सुरक्षा कवच (Lock-in Period):  एम.पी. नगर पालिका अधिनियम के तहत, किसी प्रतिनिधि के खिलाफ रिकॉल की प्रक्रिया चुनाव के शुरुआती 2 साल (लॉक-इन पीरियड) के बाद ही शुरू की जा सकती है।
  • बैलेट पेपर का मनोवैज्ञानिक पक्ष:  साक्षरता की कमी को देखते हुए राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रतीकों का सहारा लिया। बैलेट पेपर पर दो चित्र थे—एक ‘खाली कुर्सी’ और दूसरा ‘कुर्सी पर बैठा व्यक्ति/महिला’ (लिंग-विशिष्ट चित्र)। मतदाता को यह तय करना था कि कुर्सी खाली करनी है या व्यक्ति को बनाए रखना है।
  • आंकड़ों का आईना:  2000 से 2015 के बीच 33 रिकॉल चुनाव हुए, जिनमें से 17 मामलों में प्रतिनिधियों को पदमुक्त कर दिया गया।
  • संगीता बंसल बनाम प्राकृतिक न्याय:  हरदा नगर पालिका की अध्यक्ष संगीता बंसल का मामला इस कानून की कमियों को उजागर करता है। उन्हें हटाए जाने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी कि उन्हें अपनी सफाई देने का अवसर नहीं मिला, जो ‘प्राकृतिक न्याय’ (Natural Justice) के विरुद्ध है। हालांकि कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया, लेकिन यह सवाल छोड़ दिया कि क्या यह प्रक्रिया केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का हथियार बन रही है?इसी कड़ी में, हरियाणा (2020) ने भी 50% मतदाताओं की लिखित मांग और 2/3 गुप्त मतदान के जरिए रिकॉल का प्रावधान लागू किया है, जबकि बिहार में 20% पंचायत मतदाताओं की मांग पर यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
जवाबदेही का हथियार या अस्थिरता का नुस्खा?

RTR के पक्ष और विपक्ष का संघर्ष दरअसल लोकतंत्र के दो बुनियादी मॉडलों के बीच का वैचारिक युद्ध है:1. ‘डेलिगेट’ बनाम ‘ट्रस्टी’ मॉडल:  डेलिगेट मॉडल में नेता जनता का ‘एजेंट’ होता है, जिसे हर कदम पर जनता की इच्छा का पालन करना होता है। इसके उलट, ‘ट्रस्टी’ मॉडल में नेता एक स्वतंत्र न्यासी होता है, जिसे व्यापक लोकहित में कड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता होती है। RTR लागू होने पर प्रतिनिधि स्वतंत्र निर्णय लेने के बजाय केवल ‘लोकप्रिय’ दिखने के दबाव में आ सकते हैं।2. वित्तीय बोझ और विकास की प्राथमिकताएं:  भारत में एक लोकसभा चुनाव का खर्च लगभग ₹60,000 करोड़ तक पहुंच जाता है। विडंबना यह है कि जहाँ देश को बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य पर निवेश की जरूरत है, वहां बार-बार होने वाले रिकॉल चुनाव अर्थव्यवस्था को लहूलुहान कर सकते हैं। इसके अलावा, राजनीतिक प्रतिशोध (Political Vendetta) के लिए इस अधिकार का दुरुपयोग होने की संभावना भी बनी रहती है।

वैश्विक सबक: ब्रिटेन की सावधानी बनाम वेनेजुएला का तनाव

दुनिया ने RTR को अलग-अलग चश्मे से देखा है:

  • यूनाइटेड किंगडम (UK):  यहाँ का ‘Recall of MPs Act 2015’ अत्यधिक सतर्कता का उदाहरण है। रिकॉल तभी हो सकता है जब सांसद को जेल हुई हो या संसद से कम से कम 10 दिनों के लिए निलंबित किया गया हो। साथ ही, 10% पंजीकृत मतदाताओं के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। यह ‘संस्थागत स्थिरता’ का मॉडल है।
  • स्विट्जरलैंड:  स्विस कैंटन में इसे एक ‘सुरक्षा वाल्व’ (Safety Valve) माना जाता है। 19वीं सदी में हिंसा और क्रांतियों को रोकने के लिए इसे एक संस्थागत मार्ग के रूप में अपनाया गया था, ताकि जनता का आक्रोश सड़कों पर नहीं, बल्कि मतपेटी में निकले।
  • वेनेजुएला:  इसके विपरीत, वेनेजुएला जैसे देशों में राष्ट्रीय स्तर पर रिकॉल ने राजनीतिक ध्रुवीकरण और शासन में भारी अस्थिरता को जन्म दिया है।
संवैधानिक भूलभुलैया: राघव चड्ढा और वरुण गांधी के प्रस्ताव

हाल ही में राघव चड्ढा (AAP) ने नेताओं में “जनता का डर” पैदा करने के लिए इसकी वकालत की। इससे पहले 2016 में वरुण गांधी ने एक निजी विधेयक पेश किया था, जिसमें  75% असंतोष  की शर्त रखी गई थी। विश्लेषकों का मानना है कि 75% की यह सीमा इतनी कठोर है कि इसे व्यावहारिक रूप से हासिल करना लगभग असंभव है।राष्ट्रीय स्तर पर RTR लागू करना एक ‘संवैधानिक भूलभुलैया’ (Constitutional Maze) है। भारत में अनुच्छेद 75 और 164 के तहत ‘सामूहिक उत्तरदायित्व’ (Collective Responsibility) का सिद्धांत लागू होता है। यदि जनता किसी एक प्रभावशाली मंत्री को रिकॉल कर लेती है, तो पूरे मंत्रिमंडल के अस्तित्व और स्थिरता पर संकट खड़ा हो सकता है। यह विधायी कार्यप्रणाली और कार्यपालिका के संतुलन को बिगाड़ सकता है।

निष्कर्ष: भविष्य की ओर एक कदम

‘राइट टू रिकॉल’ कोई ऐसी जादुई छड़ी नहीं है जो रातों-रात हमारी राजनीति को साफ कर देगी। यह एक दोधारी तलवार है। यदि इसे बिना सुरक्षा उपायों के लागू किया गया, तो यह अराजकता का कारण बनेगा, और यदि इसकी शर्तें (जैसे वरुण गांधी का 75% प्रस्ताव) बहुत कठिन रखी गईं, तो यह केवल कागजों पर सिमट कर रह जाएगा।सवाल केवल कानून बनाने का नहीं है, बल्कि ‘चुनावी साक्षरता’ का है। हमें एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता है जहाँ जवाबदेही और स्थिरता के बीच संतुलन हो। अंत में, एक विचारोत्तेजक प्रश्न खड़ा होता है:  “क्या हम एक ऐसे परिपक्व लोकतंत्र के लिए तैयार हैं जहाँ जनता केवल पांच साल में एक बार नहीं, बल्कि हर दिन अपने प्रतिनिधि की परीक्षा ले सके?”  चुनाव सुधारों का असली गंतव्य शायद यही है।


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