न्यायाधीश ही चुनते हैं न्यायाधीशों को? कॉलेजियम बनाम NJAC की वह कहानी जो आपको जाननी चाहिए

Spread the love

1. प्रस्तावना: एक संवैधानिक रहस्य

collagium 1

कल्पना कीजिए एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की, जहाँ न्यायाधीश ही यह तय करते हैं कि उनके साथ न्यायपीठ पर कौन बैठेगा। भारत की न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया विश्व के किसी भी अन्य लोकतंत्र की तुलना में न केवल अनूठी है, बल्कि एक संवैधानिक पहेली भी है। जिस ‘कॉलेजियम’ प्रणाली पर आज तीखी बहस छिड़ी है, उसका उल्लेख मूल संविधान में कहीं है ही नहीं। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसे न्यायपालिका ने स्वयं ‘न्यायिक पुनरावलोकन’ (Judicial Review) के माध्यम से गढ़ा है। विडंबना यह है कि संविधान निर्माताओं ने जहाँ ‘परामर्श’ की कल्पना की थी, वहाँ न्यायपालिका ने ‘आत्यंतिक प्रधानता’ (Absolute Primacy) स्थापित कर ली। क्या यह लोकतंत्र के ‘शक्ति संतुलन’ के सिद्धांत का उल्लंघन है, या न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बचाने का एकमात्र रास्ता?

2. संविधान में ‘कॉलेजियम’ शब्द का न होना: एक न्यायिक नवाचार

कॉलेजियम प्रणाली वास्तव में एक ‘न्यायिक नवाचार’ (Judicial Innovation) है, जिसे किसी विधायी अधिनियम या संवैधानिक संशोधन के बजाय ‘जजों के मामलों’ (Judges Cases) के माध्यम से विकसित किया गया। मूल संविधान के तहत नियुक्तियों की शक्ति राष्ट्रपति में निहित थी, जिसे न्यायपालिका के साथ केवल विचार-विमर्श करना था।

अनुच्छेद 124(2): “उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति… उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श (Consultation) करने के पश्चात्… करेगा जिनसे परामर्श करना वह इस प्रयोजन के लिये आवश्यक समझे।”

इस ‘परामर्श’ शब्द की व्याख्या को समय के साथ बदलकर न्यायपालिका ने नियुक्तियों की प्रक्रिया को अपने पूर्ण नियंत्रण में ले लिया, जो वैश्विक स्तर पर एक दुर्लभ मिसाल है।

3. ‘परामर्श’ से ‘सहमति’ तक का वह ऐतिहासिक यू-टर्न

c2

भारतीय न्यायपालिका ने 1981 से 1998 के बीच अपनी नियुक्ति प्रक्रिया में एक बड़ा वैचारिक यू-टर्न लिया। इस विकासक्रम को समझना किसी भी विधिक विश्लेषक के लिए अनिवार्य है:

  • प्रथम न्यायाधीश मामला (1981): सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि ‘परामर्श’ का अर्थ ‘सहमति’ (Concurrence) नहीं है। इसने नियुक्तियों में कार्यपालिका (Executive) को सर्वोच्च शक्ति प्रदान की।
  • द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993): कोर्ट ने अपने पिछले फैसले को पलटते हुए ‘परामर्श’ को ‘सहमति’ के रूप में परिभाषित किया। यहीं से कॉलेजियम का जन्म हुआ और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी हो गई।
  • तृतीय न्यायाधीश मामला (1998): राष्ट्रपति के संदर्भ (Article 143) के बाद कॉलेजियम का विस्तार किया गया। अब सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति के लिए CJI और 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशों की एक संस्थागत राय अनिवार्य कर दी गई।

4. NJAC की विफलता और ‘चौथे न्यायाधीश मामले’ (2015) का सच

संसद ने 2014 में 99वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ (NJAC) बनाकर कॉलेजियम को बदलने का प्रयास किया। हालाँकि, 2015 में ‘चौथे न्यायाधीश मामले’ (Fourth Judges Case) में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया।

कोर्ट की सबसे बड़ी आपत्ति NJAC में ‘वीटो’ की शक्ति को लेकर थी। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, यदि आयोग के कोई भी दो सदस्य असहमत होते, तो नियुक्ति नहीं हो सकती थी। इसका अर्थ यह था कि दो ‘प्रख्यात व्यक्ति’ (जिनकी योग्यता स्पष्ट नहीं थी) मिलकर CJI और वरिष्ठ न्यायाधीशों की ‘एकमत अनुशंसा’ (Unanimous Recommendation) को भी ठुकरा सकते थे।

जस्टिस जे.एस. खेहर ने ‘पारस्परिकता की वैध शक्ति’ (Legitimate power of reciprocity) का तर्क देते हुए चेतावनी दी कि राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा नियुक्त न्यायाधीश के मन में उनके प्रति कृतज्ञता की भावना पैदा हो सकती है, जो निष्पक्षता को खतरे में डालती है।

c3

5. ‘अंकल जज सिंड्रोम’ और पारदर्शिता की चुनौतियाँ

कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना के केंद्र में ‘अंकल जज सिंड्रोम’ (Uncle Judge Syndrome) है, जो भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव की ओर इशारा करता है।

  • विविधता का अभाव: आंकड़ों के अनुसार, 2018-2022 के बीच लगभग 79% उच्च न्यायालय के न्यायाधीश उच्च जातियों से थे, जबकि महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 4-11% के बीच रहा। NJAC ने एक ‘प्रख्यात व्यक्ति’ के रूप में SC/ST/OBC/अल्पसंख्यक या महिला की भागीदारी अनिवार्य करने की कोशिश की थी।
  • अमेरिकी मॉडल से तुलना: जहाँ अमेरिका में ‘सीनेट हियरिंग’ के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित की जाती है, वहीं ब्रेट कवानो (2018) जैसे मामलों ने वहाँ ‘सार्वजनिक ध्रुवीकरण’ (Public Polarisation) के जोखिम को भी उजागर किया है।
  • कार्यपालिका की वर्तमान भूमिका: एक “इनसाइडर” अंतर्दृष्टि यह है कि वर्तमान व्यवस्था में भी कार्यपालिका पूरी तरह बाहर नहीं है। ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (MoP) के तहत इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) उम्मीदवारों की जाँच करता है और राज्यपाल/मुख्यमंत्री अपनी टिप्पणी देते हैं, लेकिन अंतिम शब्द कॉलेजियम का ही होता है।

6. क्या कोई ‘परफेक्ट’ सिस्टम संभव है? सोली सोराबजी का दृष्टिकोण

इस बहस में संतुलन लाने के लिए पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी और जस्टिस जोसेफ के विचार महत्वपूर्ण हैं। जस्टिस जोसेफ ने कॉलेजियम में ‘विश्वास की कमी’ (Trust Deficit) और कार्यपालिका की ‘सक्रिय चुप्पी’ (Active Silence) की ओर संकेत किया है।

सोली सोराबजी के अनुसार: “स्वतंत्रता को केवल कानून बनाकर लागू नहीं किया जा सकता। एक न्यायाधीश को अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से भी स्वतंत्र होना चाहिए। कुल मिलाकर, मैं कार्यपालिका की तुलना में न्यायाधीशों पर अधिक भरोसा करूँगा।”

विशेषज्ञों का मानना है कि कॉलेजियम दोषपूर्ण हो सकता है, लेकिन कार्यपालिका का हस्तक्षेप न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए अधिक घातक हो सकता है।

7. निष्कर्ष: भविष्य की राह और MoP में सुधार की गूँज

c4

भविष्य की राह ‘मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर’ (MoP) के प्रभावी सुधारों में निहित है। एक वरिष्ठ विधिक विश्लेषक के रूप में, निम्नलिखित सुधार अनिवार्य प्रतीत होते हैं:

  1. स्थायी सचिवालय: प्रत्येक उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में उम्मीदवारों के डेटा और रिक्तियों के प्रबंधन के लिए एक स्थायी सचिवालय हो।
  2. खुली आवेदन प्रक्रिया: अनौपचारिक चयन के स्थान पर एक पारदर्शी आवेदन प्रक्रिया हो, ताकि बार के योग्य वकीलों को समान अवसर मिले।
  3. पात्रता मानदंड (Eligibility Benchmarks): वकालत के वर्षों, महत्वपूर्ण निर्णयों और ‘प्रो-बोनो’ (मुफ्त विधिक सेवा) कार्यों के आधार पर स्पष्ट पात्रता मानदंड कोडिफाइड किए जाएँ।
  4. शिकायत निवारण: नियुक्तियों में अखंडता सुनिश्चित करने के लिए एक औपचारिक तंत्र बनाया जाए।

आज प्रश्न यह नहीं है कि कौन नियुक्त करता है, बल्कि यह है कि क्या वह प्रक्रिया जवाबदेह है। क्या हम न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए पारदर्शिता की बलि देते रहेंगे, या एक नए ‘मध्य मार्ग’ को अपनाने का साहस दिखाएंगे?


Spread the love

Leave a Comment